Sunday, 10 July 2011

PARMATMA: DURGA

PARMATMA: DURGA: " माँ दुर्गा बस् एक क्लिक करें और भगवती के नों स्वरूपों में से सात स्वरूपों के प्रत्यक्ष दर्शन करें . CLICK&REALIZE. प्रथमं श..."

DURGA

        माँ दुर्गा

 

बस् एक क्लिक करें और भगवती के नों स्वरूपों में से सात स्वरूपों के प्रत्यक्ष दर्शन करें.  CLICK&REALIZE.


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारणी
त्रतीयं चंद्रघंटेति कुष्मांनडेति चतुर्थकम
पंचमं स्कन्दमातेती षष्ठम कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम
नवमं सिद्धि दात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

शैलपुत्री सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहिला स्वरूप हैं पत्थर मिटटी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं. इस पूजन का अर्थ है प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना.
ब्रह्मचारिणी; जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप का प्रादुर्भाव है. जड़ चेतन का संयोग है. प्रत्येक अंकुरण में इसे देख सकते हैं.
चंद्रघंटा भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखरी (वाणी) है.
कुष्मांडा अर्थात अंडे को धारण करने वाली; स्त्री ओर पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है जो भगवती की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है.
स्कन्दमाता पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है अथवा प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता स्कन्द माता हैं.
कात्यायनी के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता  हैं. यह देवी का छटा रूप है.
कालरात्रि देवी भगवती का सातवां रूप है जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है.
भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है. महागौरी का आठवां स्वरूप गौर वर्ण है. यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मांतर की साधना से पाया जा सकता है. इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध हो जाता है. इसलिए इसे सिद्धदात्री कहा है.
                      ऊँ तत् सत् 

Saturday, 9 July 2011

PARMATMA: BHAGWADGEETA - WHAT AFTER DEATH?



गीता शास्त्र में श्री भगवान द्वारा मृत्यु के समय जीवात्मा किस प्रकार देह का त्याग करता है इसे सुस्पष्ट किया गया है। कर्मेन्द्रियां अपना कार्य बन्द कर देती हैंउनका ज्ञानजिसके द्वारा वह संचालित होती हैंज्ञानेन्द्रियों में स्थित हो जाता है। ज्ञानेन्द्रियां अपना ज्ञान छोड़ देती हैं और वह ज्ञान विषय वासनाओं एंव प्रकृति सहित पंच भूतों में स्थित हो जाता है। पंच भूत भी ज्ञान छोड़ देते हैंवह गन्ध में स्थित हो जाता है। गन्धरस में स्थित हो जाती है। रसप्रभा में स्थित हो जाती है। प्रभास्पर्श में स्थित हो जाती है। स्पर्शशब्द में स्थित हो जाता है। शब्द मन मेंमन बुद्धि मेंबुद्धि अहंकार मेंस्थित हो जाती है। अहंकार  अपरा (त्रिगुणात्मक) प्रकृति में स्थित हो जाता है। त्रिगुणात्मक प्रकृति (अपरा) जीव प्रकृति (परा) में स्थित हो जाती है। जीव अव्यक्त में अपने कर्मों अपनी प्रकृति के साथ स्थित हो जाता है।

 पुनः अव्यक्त से ही जीव अपनी प्रकृति और कर्मों के साथ नवीन शरीर में बीज रूप से स्थित होकर शरीर धारण करता है तथा पूर्व जन्म की प्रकृति और कर्मानुसार कर्मफल भोगता है और यह क्रम चलता रहता है। यह सत्य है कि बीज का नाश नहीं होता है।

 जीव मृत्यु के बाद किसी भी लोक में स्वप्नवत रहता है। स्वप्न में यदि कोई राजा है या कोई विषय भोग करता है तो नींद खुलने तक वह उसका पूर्ण आनन्द लेता है। इसी प्रकार यदि कोई मुनष्य स्वप्न में मल मूत्र में पड़ा रहता हैआग में जलाया जाता है अथवा अन्य कोई यातना भोगता हैतो उस यातना को भी पूर्ण रूप से स्वप्नवत अवस्था में भोगता है। मृत्यु के बाद जीवात्मा भी देह त्यागकर पहले घोर निद्रावस्था में होता है पुनः स्वप्नावस्था में आता है और वहाँ कुछ समय या लम्बे समयजो सैकड़ों वर्षों का भी हो सकता है। परन्तु आत्म स्थित योगी पुरूष जब देह त्याग करते हैं तो उनके संकल्प विकल्प समाप्त हो जाते हैंउनकी विषय वासनाएं समाप्त हो जाती हैं। उनका ज्ञान पूर्ण और शुद्ध हो जाता है। वह ज्ञानेन्द्रियों से लेकर आत्मा तक परम शुद्ध अवस्था के कारण आत्म रूप में जब स्थित होता है तो परम शुद्ध होता हैउसमें विषय वासनाऐंकर्म बन्धन नहीं होते। वह देह से अलग हो जाता हैवह घोर निद्रावस्था अथवा स्वप्नावस्था से परे हो जाता है। स्वर्ग-नरक या अन्य दिव्य लोक उसके लिए नहीं होते क्यों कि वह प्रकृति  बन्धन से मुक्त हो जाता है। समाधि अवस्था में केवल पूर्ण एवं शुद्ध ज्ञान मेंजिसमें कोई हलचल नहींतरंग नहींस्थित रहता है.
आत्मा ज्ञान का MOLECULE है.वह जब पदार्थ को  चैतन्य करता है तो जीवन है, पदार्थ में जब वह सुप्त हो जाता है अथवा जब ज्ञान का संचरण रुक जाता है तो मृत्यु है.

BHAGWADGEETA-ATMA

                       आत्मा  

वह एक देव ही सब जड़ चेतन में छिपा हुआ सबमें व्याप्त सब प्राणियों के मन को जानने वाला परमात्मा है. वह सबके कर्मो का अधिष्ठाता. सब जड़ चेतन का निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतन स्वरूप सर्वथा विशुद्ध और गुणों से परे है.
वह सब कुछ जनता है, वह सभी जड़ चेतन की उत्पत्ति स्तिथि और अन्त का कारण है. वह करता हुआ भी अकर्ता है. उसकी और केवल बुद्धि के सहारे ही चला जा सकता है परन्तु इस विलक्षण परमतत्व की प्राप्ति उसे ही होती है जिसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को व्यक्त कर देता है.
श्री भगवान के वचन हैं, मुझ आत्मतत्व में ही मन लगा, मुझ आत्मतत्व में ही बुद्धि लगा; तू आत्म स्वरूप को प्राप्त होगा इस विषय में  संशय मत कर.

यह आत्मतत्व ही परम बोध है,परम विशुद्ध ज्ञान है, 


महाबुद्धि है

DIVINE LOVE

 
 कृष्ण प्रेम
श्री भगवान गोपियों से कहते हैं, जो प्रेम करने पर प्रेम करते हैं वह स्वार्थी हैं, उनका सारा प्रयत्न लेन देन  मात्र है. उनमें न सोहार्द है न धर्म. जो लोग प्रेम न करने वाले से भी प्रेम करते हैं उनका ही प्रेम निश्छल है, सोहार्द व धर्म पूर्ण है. इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रेम करने वाले से भी प्रेम नहीं करते. जो अपने स्वरुप में स्तिथ रहते हैं जिनके लिए दूसरा कोई नहीं है. दूसरे वे हैं जिन्हें द्वैत भासित होता है पर उन्हें किसी से कोई प्रयोजन नहीं. वे आत्म तृप्त होते हैं. तीसरे जानते ही नहीं कि कौन उनसे प्रेम करता है और चोथे वो जो अपना हित करने वाले ,प्रेम करने वाले से भी द्रोह करते हैं.
परन्तु हे गोपियो मैं तो प्रेम करने वाले से भी प्रेम जैसा व्यवहार नहीं करता जैसा करना चाहिए. मैं इसलिए ऐसा करता हूँ कि उनकी चित्त वृत्ति मुझ में अर्थात अत्मतत्व में लगी रहे. मैं सदा परोक्ष अपरोक्ष रूप से प्रेम करता हूँ पर उसे प्रकट नहीं करता. मेरा प्रेम अहैतुक है.    
 जैसा मैं हूँ वैसी तुम हो. मुझमें तुममें भेद नहीं है.

GYAN -VIGYAN

.      
  सुषुप्ति और समाधि
       
निद्रा की सुषुप्ति अवस्था में जीव परमतत्व में विलीन हो जाता है पुनः अपनी प्रकृति और कर्म प्रारब्ध लेकर जागता है, फिर जहाँ से चले वहीँ पहुँच जाता है अतः सुषुप्ति से बोध नहीं होता.                                           
   निद्रा में स्वप्नावस्था का समय लम्बा होता है सुषुप्ति का समय कुछ ही मिनिट का होता है जहाँ संसार और प्रारब्ध है. इसलिए  समाधि  का रास्ता चुना गया जहां सुषुप्ति भी है और बोध भी है.
   सुषुप्ति अवस्था में इन्द्रयाँ, मन, बुद्धि, प्रकृति अपने कर्मो के साथ ज्ञान में लय हो जाती है पुनः स्वप्नावस्था अथवा जागाने पर  ज्ञान को आच्छादित कर देह में चारों ओर फैल जाती हैं. अतः सुषुप्ति का लाभ मात्र इतना है कि ज्ञान के स्पर्श मात्रा इनमें स्फूर्ति का संचरण हो जाता है. यही क्रम म्रत्यु के पश्चात भी चलता है.
       बोध केवल जाग्रत अवस्था में ही हो सकता है.जहाँ इन्द्रियां, मन, बुद्धि जाग्रत अवस्था में बोध को प्राप्त होती हैं. उस समय उस परम ज्ञान ,परम आनन्द, परम शांति का लाभ करते हुए पुरुष संसार भूल जाता है, देह को भूल जाता है, यही समाधि है.

BHAGWADGEETA-धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र


 

 धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

क्या कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है? क्या कोई लड़ाई का मैदान धर्म भूमि हो सकता है? क्या हम एक लीक का अनुसरण करते हैं? गीता के सभी भाष्यकारों ने धर्म के शास्त्रानुकूल अर्थ को क्यों विस्मृत किया?
पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं- हे संजय! कुरूक्षेत्र में युद्ध की आशा से एकत्र भिन्न भिन्न जीव स्वभाव को धारण किए शूरवीर जिनकी प्रकृति एक दूसरे से नितांत अलग है मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
यहाँ धर्म शब्द महत्वपूर्ण है। धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाले को आत्मा कहा जाता है और जिसे धारण किया गया है वह प्रकृति है। अतः सुस्पष्ट है इस श्लोक में धर्म शब्द का अर्थ जीव स्वभाव है जिसे प्रकृति भी कहते हैं और क्षेत्र शब्द का अर्थ शरीर है। भगवद्गीता के अन्य प्रसंगों में भी इसी बात की पुष्टि होती है. यथा स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मः परधर्मः भयावहः’, अपने स्वभाव में स्थित रहना, उसमें मरना ही कल्याण कारक माना है। यह धर्म शब्द गीता शास्त्र में अत्याधिक महत्वपूर्ण है। श्री भगवान ने सामान्य मनुष्य के लिए स्वधर्म पालन; स्वभाव के आधार पर जीवन जीना परम श्रेयस्कर बताया है।
महर्षि व्यास ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दृष्टि से धर्म का अर्थ है धारण करने वाला आत्मा और क्षेत्र का अर्थ है शरीर। इस दृष्टिकोण से पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं, हे संजय, कुरूक्षेत्र में जहाँ साक्षात धर्म, शरीर रूप में भगवान श्री कृष्ण के रूप में उपस्थित है वहाँ युद्ध की इच्छा लिए मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?
गीता की समाप्ति पर इस उपदेश को स्वयं श्री भगवान ने धर्म संवाद कहा। धर्म, जिसने धारण किया है, वह आत्मतत्व परमात्मा शरीर रूप में जहाँ उपस्थित है, यह भी ब्रह्मर्षि व्यास जी के चिन्तन में रहा होगा। अतः व्यास जी द्वारा यहाँ धर्म क्षेत्र शब्द का प्रयोग सृष्टि को धारण करने वाले परमात्मा श्री कृष्ण चन्द्र तथा धृतराष्ट के जीव भाव (जिसे धारण किया है) को संज्ञान में लेते हुए किया गया है। धर्म संस्थापनार्थाय’, से भी इस बात की पुष्टि होती है। इस श्लोक में महर्षि व्यास ने धर्म शब्द ईश्वर एवं जीव दोनों स्वभावों के लिए प्रयोग कर और क्षेत्र शब्द जहाँ यह दोनों रहते हैं (शरीर) के लिए करते हुए सम्पूर्ण गीता का सार एक श्लोक में कह दिया है।


(सामान्यतः कुरुक्षेत्र को धर्म क्षेत्र कहा जाता है वह मात्र अज्ञानता है।)